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#मेरी कल्पनाएं ।।।।

कल्पनाएं कहा क्या नहीं करवा देती है वो क्या सोचती है किसे हम कभी कबार बहुत ज्यादा सोचते हैं जो कभी हो ही नहीं सकता है बरसों पहले जिस प्यार को नहीं समझ पाया हूँ आज फिर उस दुनिया में जाने के उत्साहित हु तो कोई मुझे ले जाने को राजी नहीं कोई ऐसा नहीं है कि आओ घुमे इस संसार में जहाँ हमारी मेरी मंजिलें छुपी हुई है उन्हें खोजे कुछ तुम मेरी मदद करो कुछ मैं तुम्हारी मदद करती हूं पर शुरुआत कोन करेगा कोन कब मिलेगा? इसका फैसला कोनसा डायरेक्टर करेगा? मेरी जिंदगी बिल्कुल एक फिल्म माफिक चल रही है दो किरदारों को मिलाने के कोई बोले एक्शन और हम भी फिल्म के माफिक मिले एक प्रेमी का वो उसी अंदाज में अपनी प्रेमीका को प्रस्ताव रखना प्यार का वो भी उसके चांद तारे तोड़ने जैसे वादे करे जो कभी संभव भी नहीं कि कोई प्रेमी अपनी प्रेमिका के लिए चांद तारे तोडे हो ? पर  में उससे एक बात जरूर कहूगा में चाँद तारे नहीं तोड़ सकता हूँ में तुम्हें आने वाले भविष्य को एक संसार देने का प्रयास जरूर करूगा जिसे आने वाली पीढ़ियों में प्रेम के प्रति प्यार और मोहब्बत स्नेह का प्रादुर्भाव हो हमारा प्रयास यह रहना चाहिए कि एक नई   GENERATION को एक नया अध्याय दे पाये उन्हें इंसानियत के बारे में बताये आखिर क्या अर्थ है इस मकबूल जिंदगी का जो 1-100 साल जिता है आदमी आखिर क्यो है यह हमारे साथ किसको बनाए रखना जब हम दोनों जिंदा रहैगे तब तक यह आवरण भी जिंदा ऐसे बहोत से रोजाना चलते मन सपने सिर्फ एक कल्पना कि दुनिया बन कर रह जाते हैं यह कल्पनाएं भी बड़ी अजीब है हमारी दूनिया और बाहरी दुनिया कभी मेल नहीं खाती है जो सपनों में हो रहा है वो हकीकत में नहीं होता है कहते ॥ सबसे सुन्दर चेहरा हम कल्पनाओं में बना सकते हैं।
पर यह कल्पनाएं आज उसका चेहरा भी नहीं बना पायी

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बस लिखने दो

कुछ दर्द ऐसे होते हैं जिन्हें छुपाना नहीं चाहिए।।
उन्हे लिख दो एक किताब की तरह।।
हर वो खुशी सा हर वो इमोशनल पल एक दरीया कि,
तरह किताबों में छाप दो।।
क्या कहेगा यह जमाना कोई फर्क नहीं पड़ता।।
क्यो कहेगा और किस लिए कहेगा यह कोई फर्क नहीं पड़ता।।

बस लिखना है………… बस लिखना है मुझे।।।

लिखना है मुझे हर उस मंजर को जिसने सही गलत बताया।।
लिखना है मुझे उस परिवार पर जो अनजाने सी मजिलौ को
अपनी बना रहे हैं।।
लिखना है मुझे उस दोस्त के बारे में जो हर वक्त एक नयी
दुनिया में ले जाते हैं।।।.

– निठल्ले कि डायरी

           

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हारे हुए लोग

हारे हुए लोग
  … “हारे हुए लोग कहा जाएगे ?
  हारे हुए लोगों के लिए कोन दुनिया बसायेगा
  तमाम शिकस्त खाए लोगों के लिए
  प्रेम में टुटे हुए लोग
सारी जिंदगी को कही दाव लगा कर
हारे हुए लोग. थके हारे हुए लोग गुमनाम लोग
वो पिता जो अब अकेले रह गये हैं.?
वो कल्पनाओं में खोया रहना वाला युवा
जो परीक्षा में फेल हो गया
वो लड़की जो तेज कदमों से घर कि तरफ लोट रही है
एक असफल लेखक
मैच हार गया खिलाड़ी
इंटरव्यू से वापस लोटा युवा
ऐसे तमाम लोग
????????????????
क्या कोई ऐसी दुनिया होगी
जहां दो हारे हुए इसांन
एक – दुसरे कि हथेलियों को थामें
कई पलों तक खामोश रह सकते हो

अपनी चुप्पी मैं तकलीफों को बाटते हूए

  
/.        – निठल्ले कि डायरी

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“उसका इन्तजार”

FILL…..

कहते हैं जिदंगी को सफलता की भुख होती है मेरे को भी हैं एक ऐसा किरदार बनने का जो मुझे खुद को पता नहीं है कि मुझे क्या बनना है पहले जिदंगी मेरी काफी अच्छी थी पर जैसे ही यह बिमारी आयी है तब इतने दिनों तक अपनी दुनिया से दुर रहुगा ऐसा सोचा नहीं था इस लोकडाउन ने काफी सारे तमाचे मारे हैं जिदंगी पर घर कि गरीबी मां कि उदासी पापाजी कि उम्मीद मुझे पर कि अब यही है जो इस दलदल से बाहर निकालेगा उन मुझ पर यकीन है कि ये साला कमीना है जो को छीन कर जियेगा पर अदरं ही अदरं काफी टुट चुका था कहते हैं बिना हिरोइन के फिल्म का कोई मतलब नहीं है वो पुरी भी नहीं होती है मैं पीछले तीन साल से सिंगल हूँ छोड़ दिया प्यार करना आज कल कोन प्यार करता है प्यार एक परफुम कि खुशबु कि तरह जब तक खुशबु है तब तक प्यार है यही हुआ मेरे साथ भी फिर छोड़ दिया अब मैं अकेला रहना पसंद करता था पर लोकडाउन ने एक नया मूकाम दिया है एक नया दोस्त शायरी लिखना कविता ब्लॉग यह सब कुछ मेरे लिए नया था मैं उन महान लोगों की किताबों में खो गया था जो इस दुनिया को नया दिया था फिर मुझे पता चला है कि साला प्यार दुबारा हो सकता है पर खुद के किरदार से अब मैं और परेशान कहा मिलेगा मेरा किरदार अब मैं घर से उदयपुर आ गया हूँ कब तक घर पर रहुगा काम भी करुगा घर पर पैसे भी भेज दुगा यही सोच कर पर अस्ल में मेरे किरदार को खोज रहा हूं जो मुझसे प्यार करेगी मेनें अब होस्टल के पीछे ही कमरा ले लिया जेब में एक भी रूपया नहीं है थोड़े बहुत थे और थोडे से दोस्तो से उधार लिए काफि कोशिश के बाद मुझे काम मिला एक फैशन माॅल मैं जहा कि सैलरी सिर्फ छ हजार है उसमें ही सब कुछ करना अब इस बात से परेशान हूँ कि मुझे मेरा किरदार मिलेगा या नहीं या ये मेरा कोई भ्रम है जो मुझे एक बड़ा हादसा देगा जिदंगी में में एक ऐसा किरदार चाहता हूं जो मेरे लिए चेलैंज हो इस समाज के लिए चेलैंज हो उसके सपने हो वो सिर्फ चार दिवारों के अंदर तक ही सीमित नहीं रहे खूल कर जिने वाली चाहिए वो मेरे लिए लडे में उसके लिए लडू वैसे मैं बता दूँ कि मैं एक लाॅ का विधार्थी हूँ मतलब एक वकील हूँ लोग वैसे ही दूर रहते हैं मुझसे क्योंकि मैं हमेशा से ही प्रेम विवाह जाति प्रथा धर्म भगवान का विरोध करता हूँ मेनें इसांन को माना इस धरती पर भगवान को नहीं इस नहीं डरता हु लोगों से जहाँ मै काम करता हूँ वहाँ ज्यादा लड़कीया हैं जो सब अपनी दुनिया में रहती है सब इन प्रथा कि शिकार हैं कोई बाल विवाह तो कोई जाति प्रथा से मेरी हर वक्त उनसे बहसें होती है उनको विरोध करना सिखा रहा हूँ मैं अब पुरी तरह से इस शहर में सैट हो चुका हूँ पर मैं खुद को अकेला महसूस करता हूँ पता नहीं मेरा किरदार मुझे मिलेगा या नहीं जानता हूं या यह सब किताबों की दुनिया में ही रहता है या उसे मे सिर्फ सपनो मैं मिलता हू पर उसका चहरा आज याद नहीं है वह मेरे लिए एक अजनबी शहर की तरह है।।।।। ।।।यह मेरे विचार है

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मायुसी में भी उम्मीद पीछा नहीं छोड़ती है।।।।

मायुसी सी में उम्मीद पीछा नहीं छोड़ती है….

                    . जाँब जिसे मैं दुर से एक हरे पहाड की तरह सी मेरी कल्पनाएं थी पर जब उस पहाड़ी के पास गया तो वौ मात्र मेरी एक कल्पनाएं ही थी जो मुझे घर से फिर से इस शहर के अंदर खीच लाई हैं मैं जब घर पर था तब खुद से काफी सारी उम्मीदें थीं सोच रहा था काम और पढाई दोनों साथ में होता जाएगा और यह मुश्किलें भरा समय निकल जाएगा पर अब सब कुछ बदल बदला सा लगता है मैं खुद खुद कर रहा हूं पता नहीं किस लिए कुछ पता नहीं क्यु कर रहा हूं नहीं जानता पर वो कहते हैं” अगर नया हैण्डपम्प लगाया जाता है तो पहले पानी हमें अंदर डालना पडता है” मेनें पानी तो नहीं डाला पर पानी भी आ गया है पर वो काफी जोर दे रहा है ऐसी ही है मेरी #LIFE भी में इस बेगाने से शहर आ तो गया पर जैब में एक भी पैसा नहीं है कमरा भी ले लिया उसे भी आधे पैसे दिए वो रोज कहता है
भाई पैसे कब देगा अब किस से पैसा लु घर वाले कि कोई कुछ बात भी नहीं कर रहा है हा बस एक मां अम्मी है जो फोन करती है वो भी किसी और फोन से बात करने के लिए घर वालों काफि बोला पर कोई असर नहीं हुआ है पता नहीं उनके अंदर क्या चल रहा है मुझे रोज परेशान करती जिंदगी ने भी सवाल करने शुरू कर दिए आखिर कब चलेगा ऐसा
    मैं भी उसे एक ही बात बोलता हु ऐसा तब तक चलेगा जब मेरी पहली सेलेरी नहीं आ जाती है तब इस मायुसी के शिकार बने रहो

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“अब तुम्हें आना चाहिए “

इस लोकडाउन ने जिदंगी ही बदल दी जेसे ही हुआ परीक्षा बदं सब बदं कोलेज होस्टल सब बदं सब कुछ बदं में भी बदं इस समय घर पर मै पागलपन नशीला पन नयी-नयी किताबों और अपने किरदारों को खोजने लगा यह 7 महीनों ने जिंदगी बिगाडी है या सुधारी है कुछ मालुम नहीं इस लोकडाउन ने मुझे एक #write बना दिया खुद को जिंदगी का किरदार समझ कर में सब कुछ कर रहा था इन सब में फिर से उसे खोजा पर वो अब तक नहीं मिला उस किरदार को खोजने के लिए में वापस उदयपुर आ गया पढाई “शहर” एक नयी जाँब सब मिल रहा है एक नया चेलेंज मुसीबतों के साथ मिला उम्मीद आयी पर मन उठते सवालों ने गैर रखा है क्या “कर रहा हूं क्या यह किरदार वैगेरे सब सोचते हैं क्या वो किरदार मिलेगा या नहीं मिलेगा यह सच में कोई पागलपन है एक बेवकूफी है क्योंकि मेरे स्टाफ के सवाल ही यहीं है कि” क्या तुम किसी से प्यार करते हो ‘कोई गर्लफ्रेंड है या नहीं *”अब उन्हें कब तक समझाए कि मैं कोन हूँ क्या चाहीये जिंदगी से खुद से क्या चाहीये क्या कर रहा क्यु कर रहा कोन है वौ कब आयेगी नहीं पता बस उसका गहरा सा इंतजार है अब आजा #YAAR PLEASE

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ढुढती आखें

वो जिदंगी जिसे हम चाहते हैं एक भविष्य की कल्पनाएं
     
       उसके तन पर साड़ी नहीं COAT – TROUSERS हो
हाथों में चुडियां नहीं, एक मैं भारतीय सविंधान व दुसरे मैं कलम हो
पैरों में पायल नहीं #BOOT हो
गलें मैं मंगलसूत्र नहीं #TIE हो
माथें पर #बिन्दी नहीं ज्ञान का प्रकाश हो
नजरों में #खोफ नहीं हिम्मत हो

       -निठल्ले कि डायरी

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अजिब सी जिदंगी कि एक मौत

कई बार सोचता हूं मृत्यु के बाद जब शव को घर के सबसे बाहर वाले कमरे में, कफन ओढाए रख देते हैं और सभी लोग  आसपास रो रहे होते हैं,तो क्या वह मृत व्यक्ति अदेह रूप से वही – कही बैठा कर सब को देख रहा होता है ?
और अगर ऐसा होता है तो उस वक्त उस व्यक्ति की चेतना किस रूप में कार्यरत होगी?
मसलन,  क्या वह यह देखकर होता होगा कि उसके चले जाने का कितना अफसोस है सब में  ?
या वह दुखी होता होगा उनका दु:ख देखकर  ?
क्या वह कोशिश करता होगा उसके आसुं पोछने की?
या वह खुद भी रोता होगा उस पल की अब तो वो अपनी जेब से रुमाल निकाल कभी किसी के आसुं नहीं पोछं पायेगा।

ऐसा हो सकता है क्या उस समय चेतना इतनी उजागर और विकसित हो जाती की वह यह भी देख पाता हो की सही मायने में दुखी कौन है उनमें और कौन है जो बस औपचारिकता निभा रहा है  ?
… अगर ऐसा होता होगा तो उसको उस सुक्ष्मता में भी धक्का लगता होगा कि इतने सालों वो कितने लोगों की परख ही न कर पाया।
मुझे मालूम है मैं अक्सर सोचते हुए दायरे लागं जाता हूँ… लेकिन क्या यह संभव है वह अदेह व्यक्ति आदतानुसार अगले दिन अपने हिस्से का पलगं सोने के लिए ठूँठता हो?
….. या गुसेलखाने में अपना ब्रश ठूँठता आ पहुंचाता हो….?
और वह ब्रश वहा न मिलने उसको फिर से एक बड़ा धक्का लगता हो… यह सोचकर कि मृत्यु एक ऐसा सच है जिसके साथ हम जल्दी समझौता कर लेते हैं

शायद उस क्षण यह स्वीकार लेता होगा कि मर तो वह बहुत पहले गया था बस फर्क सिर्फ इतना है कि अब वह अदेह है

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जिंदगी…..

क्या हमारी मौत जिंदगी का सबसे बड़ा सच अगर यही है तो क्या हमारे सामने रोज़ सुबह जो अलग अलग किरदार आते
बड़ी बड़ी मुश्किल लेकर क्या हम उन किरदारों को निभाते
है मौत हमारी जिंदगी का वो किरदार हैं जिसे हम नकार भी नहीं सकते हैं