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“उसका इन्तजार”

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कहते हैं जिदंगी को सफलता की भुख होती है मेरे को भी हैं एक ऐसा किरदार बनने का जो मुझे खुद को पता नहीं है कि मुझे क्या बनना है पहले जिदंगी मेरी काफी अच्छी थी पर जैसे ही यह बिमारी आयी है तब इतने दिनों तक अपनी दुनिया से दुर रहुगा ऐसा सोचा नहीं था इस लोकडाउन ने काफी सारे तमाचे मारे हैं जिदंगी पर घर कि गरीबी मां कि उदासी पापाजी कि उम्मीद मुझे पर कि अब यही है जो इस दलदल से बाहर निकालेगा उन मुझ पर यकीन है कि ये साला कमीना है जो को छीन कर जियेगा पर अदरं ही अदरं काफी टुट चुका था कहते हैं बिना हिरोइन के फिल्म का कोई मतलब नहीं है वो पुरी भी नहीं होती है मैं पीछले तीन साल से सिंगल हूँ छोड़ दिया प्यार करना आज कल कोन प्यार करता है प्यार एक परफुम कि खुशबु कि तरह जब तक खुशबु है तब तक प्यार है यही हुआ मेरे साथ भी फिर छोड़ दिया अब मैं अकेला रहना पसंद करता था पर लोकडाउन ने एक नया मूकाम दिया है एक नया दोस्त शायरी लिखना कविता ब्लॉग यह सब कुछ मेरे लिए नया था मैं उन महान लोगों की किताबों में खो गया था जो इस दुनिया को नया दिया था फिर मुझे पता चला है कि साला प्यार दुबारा हो सकता है पर खुद के किरदार से अब मैं और परेशान कहा मिलेगा मेरा किरदार अब मैं घर से उदयपुर आ गया हूँ कब तक घर पर रहुगा काम भी करुगा घर पर पैसे भी भेज दुगा यही सोच कर पर अस्ल में मेरे किरदार को खोज रहा हूं जो मुझसे प्यार करेगी मेनें अब होस्टल के पीछे ही कमरा ले लिया जेब में एक भी रूपया नहीं है थोड़े बहुत थे और थोडे से दोस्तो से उधार लिए काफि कोशिश के बाद मुझे काम मिला एक फैशन माॅल मैं जहा कि सैलरी सिर्फ छ हजार है उसमें ही सब कुछ करना अब इस बात से परेशान हूँ कि मुझे मेरा किरदार मिलेगा या नहीं या ये मेरा कोई भ्रम है जो मुझे एक बड़ा हादसा देगा जिदंगी में में एक ऐसा किरदार चाहता हूं जो मेरे लिए चेलैंज हो इस समाज के लिए चेलैंज हो उसके सपने हो वो सिर्फ चार दिवारों के अंदर तक ही सीमित नहीं रहे खूल कर जिने वाली चाहिए वो मेरे लिए लडे में उसके लिए लडू वैसे मैं बता दूँ कि मैं एक लाॅ का विधार्थी हूँ मतलब एक वकील हूँ लोग वैसे ही दूर रहते हैं मुझसे क्योंकि मैं हमेशा से ही प्रेम विवाह जाति प्रथा धर्म भगवान का विरोध करता हूँ मेनें इसांन को माना इस धरती पर भगवान को नहीं इस नहीं डरता हु लोगों से जहाँ मै काम करता हूँ वहाँ ज्यादा लड़कीया हैं जो सब अपनी दुनिया में रहती है सब इन प्रथा कि शिकार हैं कोई बाल विवाह तो कोई जाति प्रथा से मेरी हर वक्त उनसे बहसें होती है उनको विरोध करना सिखा रहा हूँ मैं अब पुरी तरह से इस शहर में सैट हो चुका हूँ पर मैं खुद को अकेला महसूस करता हूँ पता नहीं मेरा किरदार मुझे मिलेगा या नहीं जानता हूं या यह सब किताबों की दुनिया में ही रहता है या उसे मे सिर्फ सपनो मैं मिलता हू पर उसका चहरा आज याद नहीं है वह मेरे लिए एक अजनबी शहर की तरह है।।।।। ।।।यह मेरे विचार है

By Vishnu Bairwa

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